चंडीगढ़ (प्रवेश फरण्ड ) 



 

आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब के अध्यक्ष और सांसद भगवंत मान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पंजाब का पुराना बैरी बताया। उन्होंने कहाँ कि पूरे देश के किसान मोदी से मिलने के लिए दिल्ली पहुँचे और मोदी आँख चुराते हुए गुजरात पहुँचे। मान ने कहाँ कि मोदी देश के चल रहे प्रमुख मुद्दों से भाग रहे है। इस तरीक़े से चयनित किसानों के साथ मनगढ़त बेठक करना और उनके बातों को नकारना निंदनीय है। 

भगवंत मान ने कहा कि प्रधानमंत्री की कथनी और करनी में हमेशा दिन-रात जैसा अंतर रहा है। प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि वह किसानों को मिलने के लिए 24 घंटे उपलब्ध हैं, परन्तु प्रधानमंत्री को दिल्ली बॉर्डर पर खुले आसमान के नीचे 20 दिन से बेठे हुए किसान नजर नहीं आ रहे। बल्कि वह गुजरात में जाकर पंजाबी किसानों के साथ मिल रहें है।


भगवंत मान ने कहाँ कि गुजरात में वह जिन पंजाबी किसानों से मिलने का दावा कर रहे है, मुख्यमंत्री रहते उनकी ही ज़मीने छीन ली थी। इसको उधारण लेते हुए मान ने कहाँ कि मोदी शुरू से ही पंजाब और पंजाब के किसानों के विरोधी रहें है। गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुए पंजाबी किसानों की ज़मीनें छीनी अब प्रधानमंत्री बन के पूरे देश के किसानों की ज़मीन खोसकर अडानी-अम्बानी को देना चाहते है।

भगवंत मान से नरेंद्र मोदी से पूछा कि जब एक तरफ़ पूरे देश के किसान दिल्ली के बॉर्डर पर मोदी को मिलने बैठे हैं तो मोदी गुजरात जाकर किन लोगों के सामने बिलों को अच्छा साबित करने की कोशिश कर रहे हैं? मोदी देश के प्रधान मंत्री है या सिर्फ़ गुजरात के? मान से कहाँ की प्रधान मंत्री को किसान भी सिर्फ़ गुजराती नजऱ आता है और कारोबारी घराने भी सिर्फ़ गुजराती ही दिखाई देते है। मोदी ने किसी पंजाब के किसी भी कारोबारी को कोई लाभ नहीं पहुँचाया। मोदी के अडिय़ल रवैये से पंजाब के किसान, व्यापारी, और मज़दूर सभी परेशान है। परंतु उनको किसी की भी परवाह नहीं है। 

भगवंत मान ने केंद्रीय कृषिमंत्री नरेंद्र तोमर द्वारा असली किसान यूनियन से ही बातचीत करेंगे वाले बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि अगर आपको दिल्ली सीमा पर अंदोलन कर रहे किसान असली नहीं लगते तो अब तक इनके साथ 6 दौर में घंटो लंबी बैठकें क्यों की थी। 

भगवंत मान ने कहा कि किसानों को भ्रमित करके किसान अंदोलन को खत्म करने की नीति को छोडकऱ प्रधानमंत्री को किसानों की मांगे मान लेनी चाहिए। जब सरकार इन कृषि कानूनों में 70 प्रतिशत बदलाव के लिए तैयार है तो पूरे के पूरे कृषि कानून वापिस न लेने की हठ क्यों रख रहे हैं?

 

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